दिल की बात

दिल की बात

सत्तर की गति से उपर शायद ही कभी मैंने मोटरसाइकिल चलाई है, पर उस दिन की बात अलग है। आठ बजे रोहन और गीता की सगाई होनी है और मैं अब तक होटल अमन से लगभग पैंतीस किलोमीटर की दूरी पर था। मोटरसाइकिल भगाने के अलावा मेरे पास कोई और रास्ता नहीं था।

“वैसे भी मैं अभी मरने वाला नहीं हूँ”, मैंने ख़ुद से कहा और मोटरसाइकिल को सौ की गति से ऊपर भगाने लगा।

“अभी तो मुझे रितिका से अपने दिल की बात कहनी है। अगर उसे मैं पसंद आ जाऊँ तो शादी करनी है। उसके साथ क्रूज़ पर जाना है, पत्नीटौप जाना है… हाँ बच्चे भी तो करने हैं। एक ठीक रहेंगे या दो? दो ठीक रहेंगे, अकेला बच्चा बड़ा ही तंगदिल इंसान बन जाता है। बाँटने की आदत नहीं रहती ना उन्हें।”

न जाने मैं ख़ुद से क्या क्या बातें करता चला जा रहा था कि एक बड़ा सा ट्रक पास से गुजरा और एक तेज हवा के झोंके के साथ ही मस्तिष्क में चल रहे परिचर्चा की विषय बदल गई।

“रितिका भला क्यों मेरे प्यार को अपनाएगी? मेरे जैसे हज़ारों लड़के उसे मिल जाएँगे… ना बेकार है उससे अपने दिल की बात कहना, उसे मेरे जज़बातों की कभी कद्र नहीं होगी।”

अचानक से मेरी आँखों के ऊपर तेज रोशनी पड़ी। मैं हड़बड़ा कर बाई ओर मुड़ा और मेरे बगल से एक ट्रक लगभग मुझे छूता हुआ निकल गया।

इस हादसे से मैं संभल गया और ना सिर्फ अपनी गति कम कर ली बल्कि मन में आते हुए उन्मुक्त विचारों पर भी काबू रखा। आराम से चलने के कारण मैं होटल साढ़े नौ बजे के बाद पहुँचा। तब तक रोहन और गीता की सगाई की रस्म पूरी हो गई थी। मुझ पर नज़र पड़ते ही रोहन ने इशारों में ही नाराज़गी जाहिर की और पास आकर खड़े होने को कहा।

गीता से नज़र मीलने पर मैंने उसका अभिवादन किया पर मेरी नज़रें तो सिर्फ रितिका को ही ढूँढ रही थी। आस पास उसे न पा कर मन थोड़ा व्याकुल था। तभी सामने से वह मुझे अपनी ओर आती दिखाई दी। पास आकर उसने रोहन और गीता को सगाई की बधाई दी और मेरे ठीक बगल में खड़ी हो गई।

“कहाँ थे? कब से तुम्हें ढूँढ रही हूँ।”, खड़े होते ही रितिका ने शिकायत की।

“क्या हुआ? भूख लगी है क्या?”, मैंने उसे चिढ़ाने के लिए पूछा।

“भूख लगेगी तो खाना ढूँढूंगी ना तुम्हें क्यों ढूँढूंगी?”, उसने भी अगले ही क्षण जवाब दिया।

“अच्छा अब बोलो भी… क्यों ढूँढ रही थी मुझे?”, मैंने फिर से पूछा।

रितिका ने बताया की वापस लौटने के लिए वह जब भी टैक्सी बुक कर रही है सामने से टैक्सी ड्राईवर बुकिंग रद्द कर दे रहा है।

“कोई बात नहीं तुम मेरे साथ मेरी मोटरसाइकिल पर चलना”, कह कर मैंने उसे चिंता ना करने को कहा।

दोस्तों से बातें करते हुए खाने पर ही सवा दस बज गए थे। रोहन से कह कर मैंने रितिका के लिए हेल्मेट का इंतज़ाम करवाया। सबसे विदाई लेकर निकलने में लगभग पंद्रह मिनट और लग गए।

थोड़ी देर में ही हम राष्ट्रीय राजमार्ग पर थे। रितिका पहली बार मेरे साथ मोटरसाइकिल पर बैठी थी और शायद थोड़ी असहज थी। उसके सीट पर काफी पीछे बैठने के कारण मुझे मोटरसाइकिल की संतुलन बनाने में परेशानी हो रही थी।

तभी पीछे से खुली जीप में कुछ लड़के हमारे पास से हुड़दंग मचाते हुए निकल गए। मैंने मोटरसायकिल की गति थोड़ी धीरे कर दी ताकि वे थोड़े आगे निकल जाए। पर वे आगे जा कर रोड के किनारे रुक गए थे। थोड़ी ही देर में जब हम उनके बगल से निकले तो एक बार फिर उन लोगों ने हुड़दंग मचाना शुरू कर दिया।

इक्के दुक्के दौड़ती गाड़ियों के अलावा इस सुनसान सी सड़क पर मोटरसाइकिल रोकना भी मुझे सही नही लग रहा था। किसी तरह हम लगभग दस किलोमीटर आगे बढ़े होंगे कि हमें एक पेट्रोलपंप दिखाई पड़ा। साथ में ही एक चाय की छोटी सी दुकान थी जहाँ मैंने मोटरसाइकिल लगा दी।

“थोड़ा रुक जाते हैं”, मैनें रितिका से कहा तो वह सीट से नीचे उतर गई। चाय वाले को चाय बनाने को कह कर मैं रितिका को लेकर पास ही रखे प्लास्टिक की कुर्सियों की तरफ बढ़ गया।

शांत माहौल… लकड़ी के चूल्हे से आती सौंधी ख़ुश्बू … कुछ ही पल में हम बिलकुल सहज हो गए। मुझे लगा कि यह सब महज संयोग नहीं हो सकता। हमारा यहाँ रुकना कहीं प्रकृति की कोई साजिश तो नहीं। अगर हम सिर्फ चलते ही रहते तो मुझे अपने दिल की बात कहने का इतना अच्छा मौका कैसे मिल पाता।

“रीत”, मेरे इस नाम से पुकारे जाने पर रितिका थोड़ी आश्चर्यचकित थी।

“रीत… तुमसे एक बात पूछनी थी।”, मैंने हिम्मत कर के बात शुरू की, “तुम्हारा मेरे बारे में क्या ख़याल है?”

“क्या?”

“नहीं… मेरा मतलब है, तुम मेरे बारे में क्या सोचती हो”, मैंने हड़बड़ाहट में जो ठीक समझा कह दिया।

पर रितिका ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बस मुझे ही देख रही थी।

कहीं मैंने यह सवाल करके गलती तो नहीं कर दी, मेरे मन में एक अजीब सा डर बैठ गया।

“यही की तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो”, रितिका से देर से मिली जवाब ने मेरे व्याकुल मन को थोड़ी शांति दी।

“पर क्यों पूछ रहे हो?”, रितिका ने थोड़ा रुक कर यह सवाल दाग दिया।

मैं इस सवाल के लिए तैयार तो नही था पर मैं यह जानता था कि यह स्तिथि अभी नहीं तो कभी नहीं वाली थी।

“रीत, तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो। हम दोनों एक दुसरे को पिछले एक साल से जानते भी हैं और हम एक दूसरे के अच्छे दोस्त भी हैं। मुझे नहीं पता तुम मेरे बारे में क्या सोचती हो पर मैं तुममें एक दोस्त से आगे एक अच्छा हमसफर भी देखता हूँ। पता नहीं मुझे यह सब कहना चाहिए या नहीं…”

“नहीं कहनी चाहिए”, रितिका ने बीच में ही मेरी बात काट दी, “ऐसे तो बिलकुल भी नहीं… मैंने सोचा था जब भी तुम कहोगे तब तुम्हारे हाथों में गुलाब के फूल होंगे… पर तुम हाथों में चाय की प्याली लेकर यह सब कहोगे ऐसा मैंने कभी नहीं सोचा था”

दो पल के लिए मैं जैसे पत्थर का बन गया। जब तक मुझे कुछ समझ आता रितिका के चेहरे पर एक हल्की सी मुसकान आ गई थी। उसके चेहरे को देख कर मेरे साँसें दुबारा चल पड़ी। शरीर में जैसे रुके हुए रक्त फिर से प्रवाहित होने लगे।

“तुमने तो मेरी जान ही निकाल दी थी”, मैंने रितिका से लगभग नज़रें चुराते हुए कहा।

“तैयारी कर लो… पूरी जिंदगी तुम्हें ऐसे ही परेशान करुँगी। जाओ गुलाब ले कर आओ और दुबारा से यह सब कहो। अभी का कहा मान्य नहीं होगा।”, रितिका के आवाज़ में शरारत थी।

पेट्रोलपंप के आहते के बीच कुछ गमलों में मुझे गुलाब का पौधा दिख रहा था। रितिका को वहीं इंतज़ार करने को कह कर मैं गमलों की तरफ बढ़ा। रात के इस वक्त लगभग सारे फूल बंद पड़े थे। उनमें से एक फूल तोड़ कर मैं रितिका की तरफ बढ़ा। तभी अचानक से उन लड़कों की जीप को अपनी तरफ तेज गति से आता देख कर मेरे पैर वहीं जमीन पर जम गए। अगले ही पल एक जोरदार आवाज़ हुई और मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा गया।

पता नहीं फूल मेरी हाथों से छूट कर कहाँ गिर गई थी। मैंने हाथों से टटोल कर फूल को खोजना चाहा पर मेरे हाथ… मैं अपने ही हाथों को महसूस नहीं कर पा रहा था। रितिका के पास जाने के लिए मैं उठना चाहा पर कुछ समझ नहीं आ रहा था की मेरे शरीर के अंग मेरे ही अनुदेशों का पालन क्यों नहीं कर रहे थे।

मैंने सारी ताकत इकट्ठा कर के रितिका को आवाज़ दी…

रीऽऽऽऽऽऽत!!!!!

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