पूनम की चाँदनी

पूनम की चाँदनी

“क्या हुआ? चेहरा क्यों उतरा है तेरा?”, विक्रांत ने मेरी ओर देखते हुए पूछा।

मैं क्या कहता। दो दिन से पूनम से बात नहीं हुई थी। दो दिन से जैसे मेरी जिन्दगी रुक सी गई थी। दो दिन से न भूख लग रही थी और ना ही ठीक से सोया था। हर वक्त बस फ़ोन की तरफ ही नज़रें टिकी थी कि कब पूनम का फ़ोन आए और कब मैं उसकी आवाज़ सुन सकूँ।

पिछले सात आठ महीनों में पूनम से बात करना मेरे दिनचर्या में शामिल हो गया था। कभी सोचा भी नहीं था की उसकी आवाज़ सुने बिना ही दो रातें गुज़र जाएगी। ४८ घंटों से ज्यादा होने को आई थी। मन बेचैन था। इंतज़ार और नींद की कमी से आँखें थकी थी।

“कुछ नहीं भाई बस थोड़ी तबियत ठीक नहीं”, मैंने झूठी कहानी बनाई। पूनम और मेरे बीच की बातों को दुनिया के सामने क्यों उजागर करता?

“चल, फिर चाय पीने चलते हैं”, विक्रांत ने मोटरसाईकिल की स्टैंड ऊपर उठाते हुए कहा।

लगभग एक घंटे की बातचीत और दो दो कप चाय के बाद मैं घर पर लौटा। पूनम का अब भी कुछ पता नहीं था। कई बार इच्छा हुई की फ़ोन मिलाकर उससे बात करूँ पर उसने ही संकल्प लिया था कि अब वह अपनी पूरी जिन्दगी मुझसे कभी बात नहीं करेगी। उसके संकल्प का सम्मान करना भी मेरी जिम्मेदारी थी। मैं अपने स्वार्थ के लिए उसके संकल्प को कैसे तोड़ देता।

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हालांकि मुझे पूनम पर गुस्सा भी आ रहा था। माना कि मुझसे गलती हुई थी पर हर गलती की सजा सजा-ए-मौत तो नहीं होती। और उससे इस तरह दूर रहना मेरे लिए मौत की सजा से कम न थी। वहाँ तब भी मैं एक झटके में मर जाता पर यहां तो मैं तिल तिल कर मर रहा था।

पूनम को मेरी कविताओं से बड़ा लगाव था। मैं अक्सर उसके लिए कविताएँ लिखता रहता था। उस दिन भी मैंने उसके लिए कविता लिखना चाहा पर अशांत मन में जहाँ एक ओर भावनाओं कि आँधी आई थी वहीं दूसरी ओर शब्दों की अकाल पड़ी थी। घंटों एक कोरे काग़ज़ के सामने किसी निर्जीव मूर्ति सा बैठा रहा।

कुछ देर अपने ही ख्यालों में खोया रहने के बाद मैंने किसी तरह दो चार पक्तियाँ लिख डाली। पर उस दिन पूनम मेरे साथ कहाँ थी जो मैं उसे पढ़ाता। न ही मैं उन पंक्तियों को उसे मैसेज के द्वारा भी नहीं भेज सकता था। इतने गुस्से में मुझे छोड़ कर गई थी कि अगर मैं उसे कविता भेजता तो फ़ोन में से निकल कर मुझे दस बातें और सुनाती। जब तक उसका गुस्सा शांत ना हो तब तक स्वंय भगवान भी चाहे तो उसके आस पास भी नहीं फटक सकते फिर मैं तो इंसान मात्र था।

पर मुझे यकीन था कि पूनम एक ना एक दिन मेरे पास ज़रूर वापस आएगी, इस लिए नहीं क्योंकि उसे मेरी ज़रूरत है, वह तो स्वयं ही एक आत्मनिर्भर और समझदार लड़की है उसे मेरी ज़रूरत नहीं, पर इस लिए क्योंकि वह जानती है कि मुझे उसकी कितनी ज़रूरत है।

अंततः मैंने उस कविता को अपने ब्लॉग पर डाल दिया, अपने दिल की बात पूनम तक नहीं पहुँचा सकता था पर दुनिया को यह तो बता ही सकता था कि वह कितनी खास है।

सूरज की पहली किरण तुम,

मैं धान का भीगा एक खेत,

पूर्णिमा कि तुम हो चाँदनी,

धरती पर मैं बेजान रेत…

अनुराग जयसिंह

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