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मेरी रोहिणी
Writing was never easy, but this is what I can do the best.
Writing a good story requires peace of mind. You can write more when you have peace of mind.

मेरी रोहिणी

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आँखों में नमी थी… रोहिणी को वर्षों बाद देख कर खुद के भावनाओं पर लगाए पहरे कमजोर पड़ने लगे थे। शायद उम्र के इस आखरी पड़ाव पर नजरें भी कमजोर पड़ चुकी थी… सामने ६५ के उम्र की शरीर में मुझे मेरी २७ की उम्र वाली रोहिणी दिख रही थी।

वही झुकी सी नजरें, होंठों पर वही हल्की सी मुसकान… चार दशकों में लगभग कुछ भी नही बदला था। अगर कुछ बदला था तो वह था हमारे रिश्ते का नाम, तब हम प्रेमी प्रेमिका थे, आज दो अंजाने।

रोहिणी को करीब आता देख मैंने जल्दी से अपने आँखों के नमी को पोंछ डाला। उसे पता ना चले इसके लिए मुझे कुछ देर आँखों में कुछ चले जाने का अभिनय करना पड़ा। यह अभिनय कितना सफल हुआ यह कह पाना तो कठिन था।

“कैसे हो सुहास?”, चार दशकों के बाद रोहिणी के मुख से अपना नाम सुनने पर मुझे ऐसी खुशी का एहसास हुआ जैसे जीवन मरण के चक्र से मोक्ष मिल गई हो। निःस्वार्थ प्रेम… किताबों में पढ़ा था, पर शायद मेरा प्रेम भी निःस्वार्थ ही था। एक समय ऐसा था जब मैं उसे पाना चाहता था पर उस दिन की घटना के बाद मैं समझ गया था कि मैं किसी भी तरह से उसके लायक़ नही हूँ। पाने की चाहत ने मुझे अंधा और स्वार्थी बना दिया था। अगर तब भी मैं स्वयं को उससे दूर न करता तो मेरे जैसा पापी पूरी दुनिया में कोई और न होता।

“सब ठीक है ना सुहास?”, रोहिणी के दुबारा पूछने पर मैं वास्तविक दुनिया में वापस आ गया।

“हाँ रूही… मैं बिलकुल ठीक हूँ। तुम कैसी हो?”, मैंने उत्तर देती ही उसके हाल जानने की कोशिश की।

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“मैं भी ठीक हूँ। नीलिमा, मेरी बेटी की शादी है, क्या तुम उसे शुभाशीष देने आओगे?”, उसके आवाज में एक दर्द था।

“हाँ क्यों नहीं, तुम बुलाओगी तो मैं मौत को भी हरा कर आऊँगा”, मैं चाह कर भी अपने आँसुओं को नहीं रोक पाया। आँसुओं के दो मोटे धार मेरे दोनों आँखों से निकलते हुए मेरे गले और फिर क़मीज़ के अंदर मेरे तन को छूते हुए कहीं विलुप्त हो गए, ठीक वैसे ही जैसे उस दिन के बाद मैं रोहिणी के जीवन से विलुप्त हो गया था।

“मैंने तो तुम्हें तब भी बुलाया था पर तुम नहीं आए”, रोहिणी ने जब कहा तब उसकी नजरें मेरी नजरों से सीधा टकरा रही थी।

हर बीतते लम्हों के साथ मैं और भी असहज होता जा रहा था। मैं वापस इसलिए नहीं गया था क्योंकि मुझे यह पूर्णतः एहसास हो चुका था कि रोहिणी के लिए मैं उचित लड़का नहीं था। वह लाखों करोड़ों में एक थी, सारी दुनिया उसे पसंद करती, लोग अपने बच्चों को उसके उदाहरण देते। वह आसमान थी, मैं जमीन था, वह संगमरमर थी, मैं कोयला, वह सरल हृदय वाली फूलों सी कोमल और मैं बेवकूफ जिसने उसका दिल दुखाया था। मेरे जैसे इंसान को रोहिणी जैसी वरदान मिलना प्रकृति के विपरीत थी।

“तब की बात और थी, तब मैं आता तो तुम्हारा जीवन नरक बन जाता”, मैंने स्वयं को सम्भालते हुए कहा।

“और यह फैसला तुमने अकेले ही कर लिया”, रोहिणी के छोटे से उत्तर ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया।

“मैं वादा करता हूँ रूही अगले जनम में मैं स्वयं को तुम्हारे काबिल बनाऊँगा। तुम्हें ढूंढ कर तुम्हें अपने दिल की हर वो बात बताऊँगा जो इस जनम में मैं तुम्हें बता नही पाया। तुमसे फिर एक बार प्यार करूंगा और अगर तुमने शादी के लिए हाँ कहा तो तुम्हें अपनी अर्धांगिनी बनाऊँगा।”

“और मैंने मना कर दिया तो?” हंसते हुए रोहिणी ने पूछा।

“तो क्या, फिर एक और जनम लूंगा और फिर से तुमसे प्यार करूँगा”, मैंने भी हंसते हुए तुरंत जवाब दिया।

थोड़ी देर तक हम दोनों इसी तरह एक दुसरे को मुस्कुराते हुए देखते रहे। एक अजीब सा सुकून था मेरे मन में। ऐसा लगा जैसे उन पलों में मुझे अपने हिस्से की सारी खुशी मिल गई थी। अब जीवन से कुछ और नहीं चाहिए था।

“मुझे अब जाने की आज्ञा दो रोहिणी, मुझे अब जाना है।”, मैंने रोहिणी से कहा।

“शाम को घर ज़रूर आना, मुझे अच्छा लगेगा”, कह कर रोहिणी चली गई पर मेरे मन में एक दुविधा छोड़ गई।

मैं जहां इस दुनिया से उस दुनिया में जाने की सोच रहा था वहीं रोहिणी मुझे नीलिमा की शादी समारोह में बुला रही थी। रोहिणी की बातों को टालना मेरे लिए नामुमकिन था। किसी तरह मैं घर पहुँचा। इन चार दशकों में रोहिणी से जुड़ी हर चीज को मैंने सहेज कर रखा था। उसके दिए हुए तोहफों और खत को सँभालते सँभालते कब शादी की उम्र निकल गई पता ही नहीं चला। और एक तरह से यह अच्छा ही हुआ, अगर कोई दूसरी स्त्री मेरे जीवन में आ जाती तो मैं इन तोहफों और खतों को इस तरह सहेज न पाता।

शाम से पहले ही मुझे तबीयत कुछ ठीक नहीं लगने लगी, पर रोहिणी से किया यह आखिरी वादा मुझे निभाना ही था। मैं तैयार हो कर रोहिणी के घर की तरफ बढ़ा। चार दशकों में उसके मुहल्ले की सूरत पूरी तरह से बदल गई थी। मैं बड़ी मुश्किल से उसके घर को पहचान पाया।

बाहर से ही लोगों की भीड़ दिख रही थी। मैं अंदर गया तो रोहिणी की नजर मुझ पर पड़ी। लाल साड़ी में वह बहुत सुंदर दिख रही थी। मुसकुराकर उसने मेरा स्वागत किया और सामने बने मंच की तरफ चलने का इशारा किया। मंच पर नीलिमा वधू के रूप में खड़ी थी पास ही एक सुंदर सा लड़का वर के रूप में था। दोनों की जोड़ी बहुत ही खूबसूरत दिख रही थी। पास से देखने पर मैंने पाया कि नीलिमा की आँखें बिलकुल उसकी माँ पर गई थी।

वर वधू को शुभाशीष देने के पश्चात मैंने रोहिणी से विदाई मांगी। पर उसने रात्रिभोज में शामिल होने की आग्रह की।

“नहीं रूही, अब मुझे जाने दो। मैं फिर वापस आऊँगा, तुम्हारे पास ही आऊँगा और कहाँ जाऊँगा”, मैंने उसे समझाया पर वह मानने को तयार ही नहीं थी।

“अब मुझे जाने दो रूही, हम बिछड़ रहें हैं दुबारा मिलने के लिए, मुझे जाने दो”, कह कर मैं तेज गति से वहां से निकल गया।

सड़क पर चलते हुए मुझे अपनी पूरी जीवन चलचित्र के जैसे मेरी आँखों के सामने दिख रही थी। कभी रोहिणी का मुस्कुराता चेहरा दिखता तो कभी उसकी बातें सुनाई देती। मेरे आँखों से आँसुओं की नदी सी बह रही थी। होंठ सुख रहे थे, शरीर सुन्न सा पड़ रहा था। अचानक ही मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा गया और मैं जमीन पर गिर पड़ा।

जब आँखें खुली तब सामने नीलिमा और रोहिणी आपस में कुछ बातें कर रहीं थी। थोड़ी दूर पर कुछ और अंजाने चेहरे थे जिनमें से एक शायद नीलिमा का पति भी था। आँखें चारों ओर घुमा कर देखने पर पता चला कि मैं किसी अस्पताल में था।

“कैसे हो सुहास?”, रोहिणी की मधुर वाणी मेरे कानों पर पड़ी।

मैंने जवाब देना चाहा पर गला सूखने के कारण कुछ कह न सका। तब तक किसी ने डॉक्टर साहब को मेरे होश में आने की खबर दे दी थी।

आते ही डॉक्टर साहब ने शिकायत की, “सुहास जी! आपने कल पूरा दिन कुछ खाया क्यों नहीं था? मुझे तो लगता है आप जान बूझ कर अपने ऊपर ध्यान नहीं दे रहे हो। ऐसे तो आप बीमार पड़ जाओगे।”

मैंने डॉक्टर साहब को कोई भी उत्तर नहीं दिया। उनका कहना सत्य था, जीवन से लगाव की कोई वजह ही नहीं बची थी। शायद मैं इसी इंतजार में था कि कब मौत आए और अगले जन्म की शुरुआत हो। रोहिणी ने अगले जन्म में मेरी होने का वादा जो किया था।

डॉक्टर साहब के चले जाने पर सभी लोग जाने की तैयारी करने लगे। एक एक कर सबने पास आकर मुझसे विदाई ली। सभी के चले जाने पर रोहिणी फिर से एक बार कमरे में आई।

“सुहास! क्या तुम सच में मुझसे प्यार करते हो?”, मेरे सामने आकर उसने सीधा ही सवाल किया।

“क्या यह प्रश्न अब भी प्रासंगिक है? तुम ही कहो मैं कैसे यकीन दिलाऊँ तुम्हें?”, मैंने लड़खड़ाती आवाज में जवाब दिया।

“मैं वादा करती हूँ अगले जन्म में हम साथ होंगे। मैं ही तुम्हारी अर्धांगिनी बनूँगी। पर उसके लिए तुम्हें साबित करना होगा कि तुम मुझसे सच्चा प्यार करते हो।”, रोहिणी कि आवाज दृढ़ता का परिचय दे रही थी।

“मैं तुम्हारे लिए मर भी सकता हूँ। बोलो तुम क्या चाहती हो”, मैंने भी अपने दृढ़ निश्चय को उसके सामने उसके ही अंदाज में रखा।

रोहिणी ने अपनी उम्र की लकीरों से भरी हाथों में मेरा हाथ लिया। कुछ पल हम एक दूसरे के साँसों के सरगम को सुनते रहे फिर उसने कहा, “क्या तुम मेरे लिए कुछ दिन और जी नहीं सकते?”

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