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रुही का इंतजार
Writing was never easy, but this is what I can do the best.
Writing a good story requires peace of mind. You can write more when you have peace of mind.

रुही का इंतजार

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जोर जोर से बादल गरज रहे थे। झमाझम बारिश और कड़कती बिजली के बीच मैं चलता जा रहा था। कपड़े पूरी तरह गीले हो चुके थे।घुटनों भर पानी में समझ नहीं आ रहा था कि सामने सड़क है भी या नहीं।

रुही के शब्द मेरे कानों में किसी तीर के भाँति चुभ रहे थे। मेरी गलती बस इतनी ही थी कि मैं उसे बहुत प्यार करता था। अगर न करता तो मुझे कोई फर्क भी न पड़ता कि वो अपने जीवन में क्या कर रही थी।

अगले दस मिनट में घर के पास वाली रेलवे फाटक दिखने लगी था। यहाँ से घर सिर्फ एक किलोमीटर की दूरी पर था। घर पहुँच कर सबसे पहले मुझे हीटर जलानी थी वरना ठंड से मेरी तबीयत भी बिगड़ सकती थी। मैं और भी तेज कदमों से चलने लगा।

घर पहुँचकर गर्म पानी से नहाने के बाद मैं हीटर के सामने बैठ गया। रुही रहती तो मुझे अदरक वाली चाय बना कर पिलाती। पर रुही तो मुझे छोड़ कर जा चुकी थी। समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ। कैसे उसे समझाऊँ कि जो कुछ भी हमारे बीच हुआ उसके जड़ में बस गलतफहमियां ही थी।

मैंने फोन उठाकर उसका नम्बर लगाया पर नम्बर लगने से पहले ही कट गया। शायद उसने मेरे नम्बर को ब्लॉक कर दिया था। रुही तक पहुँचने का मेरे पास कोई रास्ता नहीं बचा था। मैंने दुबारा नम्बर लगाया पर फिर से कॉल कट गया।

“मुझे तुम्हारी शक्ल भी नहीं देखनी है”, रुही के शब्द जितने बार मेरी जेहन में आते उतनी बार दिल छलनी हो जाता।

सारी रात मैं उसके नम्बर पर व्यर्थ ही कॉल करता रहा। सुबह के चार बजने को हो रहे थे। अब तक मेरा मन बुरी तरह टूट चुका था। मुझे अच्छी तरह पता था कि रुही ने जो ठान लिया था उसपर ज़रूर अमल करती।

सारी रात मैंने आँखों में ही बिता दी। अगली सुबह मेरी आंखें ख़ून सी लाल थी। अब भी मैं बीच बीच में रुही को फोन लगा रहा था। पर हर बार फोन लगने से पहले ही कट जाता। इसी तरह कब सुबह से शाम और शाम से रात हो गई इसका मुझे पता ही नहीं चला।

एक महीने बीत गए थे। न रुही वापस आई न ही उसका फोन मिला। मैं अंदर से पूरी तरह टूट चुका था। एक महीने से मैं घर से बाहर नहीं निकला था। बची-खुची राशन  से ही अब काम चल रहा था, उस पर भी सिर्फ इसलिए कि मैं दिन के एक बार ही खााना खा रहा था।

इसी तरह दो महीने बीत गए थे। रुही अब शायद मुझे भूल चुकी थी और मैं खुद को भूल चुका था। पिछले अठ्ठाईस दिनों से घर में राशन का एक दाना भी नहीं बचा था। मेरी शरीर किसी हड्डी के ढाँचे में तबदील हो चुकी था। भूख भी अब परेशान करना छोड़ चुकी थी। शायद उसे भी अब तक समझ आ गया था कि घर में खाने को कुछ भी न था।

मैंने दीवारों पर रुही के लिए कविता लिखना शुरू किया। अगले दस दिनों में कमरे के दीवारों के कोने कोने में बस रुही का ही नाम लिखा था।

नब्बे दिन बाद दरवाजे पर मैंने दस्तक सुनी। मुझे यकीन था कि यह रुही ही होगी, “आखिर मेरी रुही मेरे पास आ ही गई”, सोच कर मैं हर्षित था। बिलकुल किसी बच्चे कि तरह मैं कूद कर दरवाजे कि तरफ भागा। आश्चर्य की बात यह थी कि मुझे जरा भी कमजोरी महसूस नहीं हो रही थी। 

दरवाजे तक जाते हुए मैंने जोर से आवाज लगाई, “रुही! आखिर तुम आ ही गई ना। मुझे मालूम था की तुम भी मुझसे उतना ही प्यार करती हो जितना मैं तुम्हें करता हूँ”

पर बाहर से उसका कोई उत्तर नहीं मिला। शायद मेरी आवाज कमरे से बाहर नहीं जा रही थी। मैंने दरवाजे की कड़ी को नीचे उतारा, पर मेरी उँगलियों के बीच से कड़ी निकल गई। मैंने फिर से कड़ी को पकड़ना चाहा पर कड़ी मेरे हाथों मे आ ही नही रही थी।

“दरवाजा नहीं खुल रहा रुही, बस एक मिनट रुको।”, मैंने जोर से चिल्ला कर कहा।

पर शायद मेरी आवाज बाहर नहीं जा रही थी क्योंकि दरवाजे पर फिर से एक बार दस्तक पड़ी। दस मिनटों तक मैं लगातार कोशिश करता रहा पर पता नहीं क्यों कड़ी मेरे हाथों में आ ही नही रही थी।

बाहर से अब कई लोगों की आवाजें आनी लगी थी। तभी किसी ने दरवाजे पर जोर से धक्का दिया। लोग शायद दरवाजे को तोड़ने की कोशिश कर रहे थे। मैं थोड़ा पीछे हटने के लिए मुड़ा कि कहीं मुझे कोई चोट न लग जाए। पर मुड़ते ही मुझे पलंग पर कोई लेटा हुआ दिखा। मैं बुरी तरह डर गया। यह कौन है? यहाँ कैसे आया? दिमाग में सौ सवाल चल रहे थे।

मैंने गौर से देखा तो पाया कि उसने मेरी ही क़मीज़ पहन रखी थी। तभी धड़ाम की आवाज के साथ दरवाजा खुल गया। मुड़ कर देखा तो भीड़ के साथ पुलिस भी थी। मैंने भीड़ में रुही को ढूँढना चाहा पर रुही कहीं नहीं थी।

हालांकि आश्चर्य की बात यह थी कि भीड़ में से एक व्यक्ति ने भी मेरी ओर देखा तक नहीं। अजीब बेरुख़ी थी, मैं महीनों से भूखा था, घर से बाहर नहीं निकला था, पर किसी को मेरी परवाह ही नहीं थी। सारा भीड़ पता नहीं क्यों मेरे पलंग पर लेटे उस व्यक्ति को घेरे खड़ा था।

“अरे भाई! कोई मुझे कुछ खाने को दो, मुझे भूख लगी है”, मैं जोर से चिल्लाया, पर सबने अनसुना कर दिया।

मुझे गुस्सा आ रहा था। पता नहीं कौन सा लाट साहब है जो मुझे छोड़ सब उसकी खातिरदारी में लगे थे। मैं भीड़ की तरफ आगे बढ़ा, “देखूँ तो आखिर कौन हैं यह महाशय”।

राहत कि बात यह थी की इतनी भीड़ के बाद भी मुझे अपने लिए रास्ता बनाने में कोई परेशानी नहीं हुई। पास जाकर देखा तो उनका चेहरा दूसरी तरफ था। शरीर पर दोनों कपड़े मेरे ही थे। मैंने उचक कर उनका चेहरा देखने की कोशिश की।

मैं सन्न रह गया! यह तो मैं ही था।

© Copyright 2020 - 2021 Anurag Jaisingh
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